रघु रुकता है, आँखें बंद करता है—फिर धीरे से आगे बढ़ता है। वह हर कदम के साथ डर को पीछे छोड़ता जाता है। बीच में वह एक बार घुटनों पर बैठ जाता है, रस्सी से लिपट जाता है—और फिर खड़ा होता है। नीचे भीड़ जमा हो चुकी है। कोई चिल्लाता है—"यह तो सपना है!" कोई रोता है, कोई तस्वीरें लेता है। पुलिस पहुँचती है, लेकिन कोई हिम्मत नहीं करता ऊपर चढ़ने की।
रघु मुस्कुराता है—"डर तो सपनों का हिस्सा है, बिल्लू। लेकिन डर के बिना जीत का स्वाद क्या?" —छतों पर रस्सियाँ बाँधकर रात-रात भर अभ्यास। हवा में चलना, संतुलन साधना, दिल को शांत रखना। एक दिन अभ्यास के दौरान रघु गिरता है—टांग में चोट, खून, डॉक्टर बोलता है—"तीन हफ्ते आराम।"
लेकिन रघु को पता था—उसे ऊपर जाना है। एक दिन उसके हाथ लगती है की कहानी—फ्रांस में एक शख्स ने ट्विन टावर्स के बीच रस्सी पर चलकर इतिहास रच दिया। रघु का दिल धड़क उठता है। उसने ठान लिया—अब वह भी करेगा कुछ ऐसा। the walk movie in hindi
माँ कहतीं, "बेटा, पैर ज़मीन पर रखना, वरना गिरोगे।"
"बस एक डोरी, बस एक संतुलन... और फिर पूरा आसमान तुम्हारा," रघु अक्सर अपनी माँ (रंजना) से कहता। रघु रुकता है
सूरज निकलता है, और रघु रस्सी पर पहला कदम रखता है। नीचे देखता है—सैकड़ों मीटर नीचे ज़मीन, ताजमहल की संगमरमरी सीढ़ियाँ, और दूर यमुना नदी चाँदी की तरह चमक रही है।
रघु दूसरी मीनार के छोर पर पहुँचता है। लेकिन वह रुकता नहीं—वह पलटता है और पैर ज़मीन पर रखना
वह फिर से बीच में पहुँचता है, इस बार अपनी हारमोनियम बजाते हुए—बिना हाथ के—बस पैरों से तार पकड़े, धुन गूँजती है—"ज़िन्दगी डोर है, तू नाच ले..." —रघु आखिरी बार उतरता है, ज़मीन पर आता है। पुलिस उसे पकड़ लेती है। लेकिन हज़ारों लोग तालियाँ बजा रहे होते हैं।