फिल्म 'ईगा' सिर्फ मनोरंजन नहीं, एक भावनात्मक यात्रा थी। नानी (नागार्जुन की आवाज़ में) मरकर भी नहीं मरा – वो एक मक्खी बनकर अपनी प्रेमिका बिंदु (समंथा) और अपने कातिल सुदीप के बीच खड़ा हो गया।
मक्खी नहीं, महाभयंकर योद्धा था ईगा! 🔥🦟
क्या किसी ने सोचा था कि एक छोटी सी मक्खी इतना बड़ा तमाशा कर सकती है? फिल्म 'ईगा' ने हम सबका दिमाग घुमा दिया था। एक तरफ सुदीप का दमदार विलेन, तो दूसरी तरफ नानी की आवाज़ में बदला लेने को बेताब मक्खी।
ये फिल्म इसलिए भी कमाल है क्योंकि इसमें आप हीरो से ज्यादा एक कीड़े से चिपक जाते हैं। आखिरी सीन में सुदीप की आँखों में डर और मक्खी की जीत... सिनेमा का स्वर्णिम पल।
ईगा ने हमें सिखाया – साइज़ मैटर नहीं करता, इरादे मैटर करते हैं। अगर मक्खी राजामौली के हाथ लग जाए, तो वो टर्मिनेटर बन जाती है। अब तक की सबसे क्रिएटिव रिवेंज फिल्मों में से एक।
गोल्डन मूवी, गोल्डन डायरेक्टर, गोल्डन परफॉरमेंस। 👏👏
कभी सोचा है, अगर आपकी मौत का बदला लेने के लिए कोई मक्खी आ जाए? 🪰🔪